Manuscript
याकूब की पत्री का परिचय
याकूब की पत्री
अध्याय 1
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विषय-वस्तु
बुद्धि और आज्ञाकारिता (1:19‑2:26) 14
दो प्रकार का ज्ञान (3:13-18) 18
बुद्धि और भविष्य (4:13-5:12) 19
धीरज के साथ प्रतीक्षा करना (5:7-12) 20
बुद्धि और प्रार्थना (5:13-18) 20
एक क्षण के लिए आप अपने भाई या मित्र के साथ बड़े होने की कल्पना करें। आप एक साथ खेले, एक साथ पढ़े और एक साथ वयस्क हुए। आपके जीवन के अधिकांश समय यह व्यक्ति आपके साथ रहा, और फिर एक दिन आपका यह मित्र या भाई परमेश्वर का "चुना हुआ" जन होने का दावा करता है। वास्तव में, यीशु के भाई याकूब के लिए यह कोई काल्पनिक दृश्य नहीं था। अपनी युवावस्था में उसे यीशु के उद्धारकर्ता होने पर संदेह था। परंतु अपने जीवन के बाद के वर्षों में वह न केवल यीशु का अनुयायी बना बल्कि यरूशलेम की कलीसिया का अगुवा बन गया और नए नियम की एक पुस्तक लिखी जो उसके नाम पर है।
001
यह याकूब की पत्री पर आधारित हमारी श्रृंखला का पहला अध्याय है, और हमने इसका शीर्षक "याकूब की पत्री का परिचय" दिया है। इस अध्याय में हम कुछ ऐसे परिचयात्मक विषयों का अध्ययन करेंगे जो हमें नए नियम के इस भाग की विश्वासयोग्य व्याख्या करने में सक्षम बनाएगा।
002
हम दो रूपों में "याकूब की पत्री के परिचय" को देखेंगे। पहला, हम इस पुस्तक की पृष्ठभूमि की खोज करेंगे। और दूसरा, हम इसकी सरंचना और विषय-वस्तु की जाँच करेंगे। आइए याकूब की पत्री की पृष्ठभूमि के साथ आरंभ करें।
003
बाइबल की किसी भी पुस्तक के बारे में कहें तो उसके लेखन के संदर्भ को अधिक से अधिक समझ लेना महत्वपूर्ण होता है। बाइबल की विभिन्न पुस्तकें लोगों द्वारा विशेष उद्देश्यों और सरोकारों के साथ वास्तविक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में लिखी गई थीं। अतः पृष्ठभूमि के ऐसे विषयों का अध्ययन करना हमें उन पुस्तकों को समझने में हमारी सहायता कर सकता है। जब हम याकूब की पत्री की प्रेरणाओं और पृष्ठभूमियों पर ध्यान देते हैं, तो हम यह समझने के लिए अधिक तैयार हो जाएँगे कि इस पत्री का क्या अर्थ था जब इसे लिखा गया था। और हम याकूब के वचनों को हमारे वर्तमान जीवनों में अधिक प्रभावशाली तरीके से लागू कर सकेंगे।
004
याकूब की पत्री की पृष्ठभूमि को समझने के लिए हम पहले पुस्तक के लेखक पर ध्यान देंगे। इसके बाद हम मूल पाठकों को देखेंगे। और अंततः हम उस अवसर की जाँच करेंगे जिसमें याकूब की पत्री लिखी गई थी। आइए याकूब की पत्री के लेखक से आरंभ करें।
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यद्यपि हम जानते हैं कि पवित्रशास्त्र पवित्र आत्मा की प्रेरणा से रचा गया है, परंतु फिर भी याकूब की पत्री के समान बाइबल की बहुत सी पुस्तकें अपने मानवीय लेखकों को भी दर्शाती हैं। और जितना अधिक हम बाइबल की पुस्तकों के लेखकों के बारे में जानते हैं, उतना अधिक हम उनके संदेश को समझने और उसकी व्याख्या करने के लिए तैयार हो जाते हैं। इसीलिए हमें इस विषय में जितना अधिक हो सीखना चाहिए कि याकूब की पत्री किसने लिखी थी।
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याकूब की पत्री के लेखक की जाँच करने के लिए हम दो विषयों पर ध्यान देंगे। पहला, हम इस पारंपरिक दृष्टिकोण की खोज करेंगे कि यीशु के छोटे भाई याकूब ने यह पत्री लिखी। दूसरा, हम लेखक के व्यक्तिगत इतिहास की खोज करेंगे। आइए इन विषयों के पारंपरिक दृष्टिकोण को देखते हुए आरंभ करें।
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याकूब 1:1 में, पत्री इस साधारण से कथन के साथ आरंभ होती है :
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परमेश्वर के और प्रभु यीशु मसीह के दास याकूब की ओर से उन बारहों गोत्रों को जो तितर-बितर होकर रहते हैं नमस्कार पहुँचे (याकूब 1:1)।
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जैसा कि हम यहाँ देखते हैं, यह पत्री स्पष्ट रूप से "याकूब" नाम के एक व्यक्ति को लेखक के रूप में पहचानती है। परंतु यह अभिवादन सटीक रूप से यह सुनिश्चित नहीं करता कि यह व्यक्ति कौन था। नए नियम में यीशु के दो शिष्यों सहित याकूब नाम के पाँच भिन्न-भिन्न पुरूष पाए जाते हैं। परंतु इन पाँच पुरूषों में से केवल दो ही होंगे जिनके पास आरंभिक कलीसिया को एक ऐसा पत्र लिखने का अधिकार प्राप्त होगा।
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इन दो में से पहला, जब्दी का पुत्र और यूहन्ना का भाई याकूब था। परंतु प्रेरितों के काम 12:2 के अनुसार 44 ईस्वी के आसपास यह याकूब हेरोदेस अग्रिप्पा - I के अधीन शहीद हो गया था। जैसा कि हम बाद में देखेंगे, यह मानने के बहुत से कारण है याकूब की पत्री हेरोदेस की मृत्यु के बाद लिखी गई थी। इसलिए इसकी संभावना बिल्कुल नहीं है कि जब्दी का पुत्र याकूब इस पत्री का लेखक हो। दूसरा याकूब, यीशु का छोटा भाई था। वह यरूशलेम में आरंभिक कलीसिया का अगुवा भी था। इन दोनों में से यह याकूब अधिक प्रमुख था और यही वह याकूब है जिसके साथ अधिकांश धर्मविज्ञानियों ने सदियों से इस पत्री को जोड़ा है।
011
इस पारंपरिक दृष्टिकोण का समर्थन करनेवाले बहुत से लोग हैं कि यीशु के भाई याकूब ने यह पत्री लिखी थी। परंतु साथ ही कुछ आपत्तियाँ भी पाई जाती हैं। आइए इस दृष्टिकोण के समर्थन के साथ आरंभ करें।
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समर्थन — पहली बात, पद 1:1 में लेखक ने केवल "परमेश्वर के और प्रभु यीशु मसीह के दास" कहने से अधिक किसी योग्यता को प्रस्तुत नहीं किया है। उसने केवल यह माना कि उसके नाम को पहचान लिया जाएगा और इसी में पर्याप्त अधिकार होगा। और इस अधिकार पर आधारित होकर उसके पत्र में एक के बाद एक कड़ा आदेश पाया जाता है। इसलिए यह आरंभिक अभिवादन यरूशलेम की आरंभिक कलीसिया में एक बड़ा पद रखने के कारण यीशु के भाई याकूब के लिए एक मजबूत पक्ष को रखता है।
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प्रैरितिक कलीसिया के दिनों में अधिकार का पूरा प्रश्न बहुत ही महत्वपूर्ण था। यीशु मसीह के अनुयायियों के इस नए समुदाय को शिक्षा देने और उसकी अगुवाई करने का अधिकार किसके पास है? उस समय कई तरह के लेख प्रचलन में थे, अधिकार जताने के कई तरह के दावे थे, और उनमें से मापदंड जो उभरकर सामने आया वह बहुत ही महत्वपूर्ण था, और वह था यीशु की सेवकाई का प्रत्यक्ष गवाह होना, जिन्होंने उसकी सेवकाई को अपनी आँखों से देखा हो; जिन्होंने स्वयं प्रभु के साथ समय बिताया हो उन्हें आरंभिक कलीसिया में शिक्षा देने के धर्मी अधिकार का दावा करने के योग्य समझा जाता था। अब निस्संदेह यीशु का भाई याकूब उसकी सेवा का प्रत्यक्ष गवाह था, पर इससे भी बढ़कर वह वास्तव में उसके जीवन का भी प्रत्यक्ष गवाह था, और इस बात ने इस विषय में एक बड़ी भूमिका अदा की कि याकूब की शिक्षा, और आरंभिक कलीसिया में याकूब की पत्री को बड़ा महत्व दिया गया।
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रेव्ह. डॉ. माईकल वॉकर
दूसरी, आरंभिक कलीसिया की गवाही इस पुस्तक के लेखक के दृष्टिकोण की पुष्टि करती है। लगभग 96 ईस्वी में लिखी गई फर्स्ट एपिस्टल ऑफ़ क्लेमेंट, और लगभग 140 ईस्वी में लिखी गई शेफर्ड ऑफ़ हेरमास दोनों पुस्तकें या तो याकूब की पत्री की ओर संकेत करती हैं या फिर इसे उद्धृत करती हैं। और ओरिगन, जिसकी मृत्यु 254 ईस्वी में हो गई थी, ने रोमियों की पत्री पर आधारित अपने टीके में कई बार याकूब की पत्री में से उद्धरण दिए हैं। ओरिगन द्वारा याकूब की पत्री का प्रयोग करना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि पुस्तक 4 के अध्याय 8 में ओरिगन याकूब की पत्री के लेखक की पहचान "प्रभु के भाई" के रूप में कराता है। हम यह भी जानते हैं कि पूर्व की कलीसिया ने, और कालांतर में पश्चिमी कलीसिया ने इस पत्र को यीशु के भाई के द्वारा ही लिखे जाने के रूप में स्वीकार किया।
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अब, इस पारंपरिक दृष्टिकोण के प्रति इतने अधिक समर्थन होने के बावजूद भी कि यीशु का भाई याकूब ही इसका लेखक था, कुछ आपत्तियाँ सामने आई हैं।
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आपत्तियाँ — आलोचनात्मक व्याख्याकारों ने कम से कम दो विकल्पों का सुझाव दिया है। कुछ व्याख्याकारों ने आरंभिक कलीसिया में एक अज्ञात याकूब की तलाश की है। वे कहते हैं कि जिस व्यक्ति ने यह पत्री लिखी है उसका नाम सचमुच याकूब ही था, परंतु वह जब्दी का पुत्र या यीशु का भाई नहीं था। वह अज्ञात बना रहता है क्योंकि उसका उल्लेख आरंभिक कलीसिया के किसी भी अन्य लेख में नहीं था। परंतु फिर भी इस विचार की कोई संभावना नहीं है। जैसा कि हमने पहले से ही ध्यान दिया है, पत्री के आरंभ में ही लेखक की पहचान की सादगी दर्शाती है कि वह बहुत ही जाना पहचाना व्यक्ति था। यह काफी संदेहपूर्ण है कि उसके बारे में कहीं कुछ भी न लिखा गया हो।
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आलोचनात्मक व्याख्याकारों के द्वारा प्रस्तुत दूसरा सिद्धांत छद्मनाम का होना है। छद्मनाम का अर्थ लिखे गए पत्रों को वास्तविक लेखक की अपेक्षा किसी दूसरे के नाम से प्रकाशित करना है। यह रीति कई विभिन्न कारणों से पहली सदी के यहूदियों के बीच प्रचलित थी। छद्मनाम का एक मुख्य कारण किसी पुस्तक या पत्री को अधिकार या महत्व प्रदान करना था। याकूब की पत्री के संदर्भ में आलोचनात्मक व्याख्याकारों ने यह तर्क दिया है कि याकूब के नाम से किसी और व्यक्ति ने कलीसिया में अपने पत्र को व्यापक स्वीकृति दिलाने के लिए उसके नाम का प्रयोग किया। अब, 2 थिस्सलुनीकियों 2:2 जैसे अनुच्छेदों के अनुसार इस रीति की निंदा पहली सदी में एक धोखे के रूप में की जाती थी। परंतु आलोचनात्मक विद्वान अब भी इस आपत्ति के पक्ष में कम से कम तीन तर्क प्रस्तुत करते हैं।
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पहला, वे कहते हैं कि यीशु के साथ लेखक के किसी भी संबंध का उल्लेख नहीं किया गया है। वे कहते हैं कि यह सोचना अकल्पनीय है कि यीशु का भाई कलीसियाओं को पत्र लिखे और अपना परिचय देते हुए पारिवारिक संबंध को प्रकट न करे। परंतु यहूदा की पत्री का लेखक यहूदा भी यीशु का भाई था। और उसने अपनी पत्री में यीशु के साथ अपने पारिवारिक संबंध का उल्लेख कभी नहीं किया। अतः छद्मनाम होने का यह तर्क अपने आप में ही बड़ा कमजोर है।
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दूसरा, कुछ आलोचनात्मक विद्वान छद्मनाम होने की संभावना इसलिए जताते हैं क्योंकि पुस्तक ऐसे प्रमाण देती है कि लेखक यूनानी संस्कृति से अवगत था, परंतु याकूब तो फिलिस्तीन का रहनेवाला एक यहूदी था। यह सच है कि याकूब की पत्री के लेखक को यूनानी संस्कृति के प्रति कुछ जानकारी अवश्य थी। उदाहरण के लिए, याकूब 3:6 में उसने "जीवन-गति" जैसे वाक्यांश का प्रयोग किया है। इस वाक्यांश का प्रयोग यूनानी दर्शनशास्त्र और धर्म में सामान्य रूप से किया जाता था। परंतु याकूब की पत्री के लिखे जाने के समय फिलिस्तीन के बहुत से सुशिक्षित यहूदियों के पास यूनानी दर्शनशास्त्र और धर्म के विषय में काफी ज्ञान था।
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इसके अतिरिक्त, जबकि नए नियम के अन्य भागों की अपेक्षा याकूब की पत्री की यूनानी भाषा अधिक अच्छी है, फिर भी यह किसी भी तरह से नए नियम की सबसे अच्छी यूनानी भाषा नहीं है। वास्तव में, यह पत्र अपनी शैली में टेस्टामेंट ऑफ़ दी ट्वेल्व पैट्रीआर्क्स तथा उस समय के अन्य यूनानी विचारधारा से प्रभावित यहूदी लेखनों के समान था।
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छद्मनाम के होने का तीसरा तर्क प्रेरितों के काम और गलातियों की पुस्तकों में याकूब के धर्मवैज्ञानिक चित्रण की विसंगतियों की ओर संकेत करता है। यह दृष्टिकोण सुझाव देता है कि याकूब की पत्री में व्यक्त किए गए कुछ विचार नए नियम की अन्य पुस्तकों में याकूब के प्रति दर्शाए गए धर्मवैज्ञानिक दृष्टिकोणों के साथ मेल नहीं खाते। उदाहरण के लिए, आलोचनात्मक व्याख्याकार प्रेरितों के काम 21:17-25 और गलातियों 2:12 जैसे अनुच्छेदों की ओर संकेत करते हैं। वे तर्क देते हैं कि इन पदों में याकूब व्यवस्था के प्रति रूढ़िवादी यहूदी-मसीही विश्वासी दृष्टिकोण के एक प्रवक्ता के रूप में दिखाई देता है। परंतु याकूब 1:25 और याकूब 2:12 में लेखक व्यवस्था के प्रति कुछ हद तक उदार दृष्टिकोण को दर्शाता, और इसे "स्वतंत्रता की व्यवस्था" कहता है।
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परंतु ये भिन्नताएँ उतनी बड़ी नहीं हैं जितनी कि आलोचनात्मक विद्वान इन्हें बना देते हैं। बारीकी से देखने पर प्रेरितों के काम और गलातियों के उदधृत किए गए पद एक उग्र यहूदी-मसीही दृष्टिकोण को प्रस्तुत नहीं करते। और प्रेरितों के काम और गलातियों में व्यवस्था के विषय में याकूब का दृष्टिकोण वास्तव में याकूब की पत्री के धर्मविज्ञान के साथ मेल खाता है।
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जैसा कि हम देख सकते हैं, इस पुस्तक के लेखक के विषय में यीशु के भाई याकूब के विरोध में दिए गए तर्क बहुत ही कमजोर हैं। याकूब के लेखक होने के पक्ष में दिए जानेवाले तर्क अधिक विश्वसनीय हैं। और इसी कारण, अधिकांश सुसमाचारिक लोग सही रूप से पुष्टि करते हैं कि यीशु का भाई याकूब ही उस पत्री का लेखक है जिसमें उसका नाम दिया हुआ है।
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हमने पारंपरिक दृष्टिकोण को देखते हुए याकूब की पत्री के लेखक होने पर ध्यान दिया है। अब, आइए याकूब के व्यक्तिगत इतिहास को और अधिक निकटता से देखें।
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मत्ती 13:55 याकूब का परिचय मरियम के एक पुत्र और यीशु के सौतेले-भाई के रूप में देता है। यह पारिवारिक संबंध याकूब की पत्री और सुसमाचारों में पाई जानेवाली यीशु की शिक्षाओं के बीच की समानताओं का कारण हो सकता है। परंतु पवित्रशास्त्र यह स्पष्ट करता है कि जब याकूब और इसके अन्य भाई बड़े हो रहे थे, तो उन्हें यह पता नहीं था कि वास्तव में उनका सबसे बड़ा भाई क्या था। जैसा कि यूहन्ना 7:5 हमें बताता है :
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क्योंकि [यीशु के] भाई भी उस पर विश्वास नहीं करते थे (यूहन्ना 7:5)।
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परंतु अपने जीवन के किसी एक मोड़ पर याकूब ने यीशु को अपना प्रभु मानते हुए उसमें उद्धार देनेवाले विश्वास को प्राप्त किया। वास्तव में, याकूब आरंभिक कलीसिया में ऐसे प्रमुख स्थान तक पहुँच गया कि पौलुस ने उसे गलातियों 2:9 में कलीसिया के "खम्भे" के रूप में संबोधित किया है। इसके अतिरिक्त, हम यह जानते हैं कि 1 कुरिन्थियों 15:7 के अनुसार यीशु अपने पुनरुत्थान के बाद याकूब के सामने प्रकट हुआ था।
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नए नियम में याकूब के अधिकार का वर्णन अच्छी तरह से किया गया है। उदाहरण के लिए, वह यरूशलेम की कलीसिया के एक अगुवे के रूप में प्रेरितों के काम की पुस्तक में कम से कम तीन बार प्रकट होता है। और प्रेरितों के काम 15 में हम उसे प्रेरितों की महासभा के प्रवक्ता के रूप में देखते हैं। यहाँ तक कि गैर-मसीहियों ने भी कलीसिया में याकूब के महत्व को स्वीकार किया था। 62 ईस्वी में याकूब की हिंसक मृत्यु का सबसे प्रचलित वर्णन यहूदी इतिहासकार जोसेफस की ओर से आया है। 93 ईस्वी में लिखित उसकी पुस्तक ऐन्टीक्वटीस की 20वीं पुस्तक के 9वें अध्याय के भाग 1 को सुनिए जहाँ जोसेफस ने याकूब की मृत्यु के चारों ओर की परिस्थितियों का विवरण दिया है :
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[हन्ना] ने यहूदी महासभा के न्यायियों को बुलाकर इकट्ठा किया, और उनके सामने यीशु, जिसे मसीह कह कर पुकारा जाता था, के भाई, जिसका नाम याकूब था, और कुछ अन्य लोगों को बुलवाया, और उन पर व्यवस्था का उल्लंघन करने का आरोप लगाकर उन पर पत्थरवाह करने का आदेश दिया।
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जब याकूब बड़ा हो रहा था, तो वह समझ नहीं पाया होगा कि वास्तव में उसका सबसे बड़ा भाई क्या था। परंतु हम जोसेफस के विवरण और पवित्रशास्त्र तथा अन्य ऐतिहासिक प्रलेखों से देख सकते हैं कि अपने वयस्क जीवन में याकूब के पास मसीह के रूप में यीशु के प्रति एक अटल समर्पण था। जैसा कि एसुबियस अपनी कृति एकलेसियास्टिकल हिस्टरी की पुस्तक 2 के अध्याय 23 में आरंभिक मसीही इतिहासकार हेगेसीपस को उदधृत करते हुए लिखा है :
031
[याकूब] यहूदी और यूनानी दोनों के लिए इस बात का एक सच्चा गवाह बन गया कि यीशु ही मसीह है।
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अब जबकि हमने लेखक से संबंधित कुछ विषयों को देखने के द्वारा याकूब की पत्री की पृष्ठभूमि पर विचार कर लिया है, इसलिए आइए हम इस पत्री के मूल पाठकों की खोज करें।
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धर्मविज्ञानी अक्सर बाइबल की किसी पुस्तक के लेखक के बारे में जितना अधिक हो सके सीखने के प्रयास में काफी समय और ऊर्जा को खर्च करते हैं। परंतु मूल पाठकों की पहचान करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि हम उचित रीति से व्याख्या करना चाहते हैं कि बाइबल की किसी पुस्तक का लेखक क्या कहना चाहता है, तो यह जानना हमारे लिए सहायक होता है कि लेखक के मूल पाठक कौन थे और वे इतिहास के उस समय के दौरान किन परिस्थितियों का सामना कर रहे थे। जैसा कि हमने पहले देखा, याकूब 1:1 में याकूब ने अपने पाठकों की पहचान ऐसे की :
034
उन बारहों गोत्रों को जो तितर-बितर होकर रहते हैं (याकूब 1:1)।
035
यह उल्लेख उन यहूदियों के लिए प्रतीत होता है जो इस्राएल से बाहर रहते थे। और 2:1 में याकूब ने अपने पाठकों को ऐसे संबोधित किया :
036
हे मेरे भाइयो, हमारे महिमायुक्त प्रभु यीशु मसीह पर तुम्हारा विश्वास पक्षपात के साथ न हो (याकूब 2:1)।
037
यदि एक साथ देखा जाए तो ये पद दर्शाते हैं कि याकूब के मूल पाठक प्राथमिक रूप से यहूदी मसीही थे जो कि फिलिस्तीन से बाहर रहते थे।
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अपनी पुस्तक में कई अवसरों पर याकूब ने अपने पाठकों को प्यार से "हे भाइयो" के रूप में संबोधित किया है। परंतु यरूशलेम में रहते हए याकूब अपने पाठकों को इतनी अच्छी तरह से कैसे जानता था कि वह इस रीति से उनसे बात करे? प्रेरितों के काम 8:1-4 में हम सीखते हैं कि स्तिफनुस की शहादत के बाद आई सताव की लहर के कारण यरूशलेम की कलीसिया के सदस्य पूरे यहूदिया और सामरिया में तितर-बितर हो गए थे। इसलिए यह संभव है कि यरूशलेम की कलीसिया के अगुवों के रूप में याकूब "बारह गोत्रों" के इन तितर-बितर हुए सदस्यों को पत्री लिख रहा हो। परंतु भले ही यह पत्री इन विश्वासियों को विशेष रूप से संबोधित न की गई हो, फिर भी ऐसा प्रतीत होता है कि याकूब के पाठक वैसी ही परिस्थितियों में यहूदी मसीही थे।
039
जिस शब्दावली का प्रयोग याकूब ने किया वह इस विचार का समर्थन करती है कि उसके मूल पाठक यीशु के यहूदी अनुयायी थे। उदाहरण के लिए, पद 2:2 में याकूब अपने पाठकों की सभाओं का वर्णन करने के लिए शब्द सुनागोगे (συναγωγη) या "आराधनालय" का प्रयोग करता है। यह यहूदियों की सभाओं को दर्शाने का विशेष तरीका था। और 5:4 में याकूब ने “सेनाओं के प्रभु” या कुरियोस साबोथ (Κυρίου Σαβαὼθ) वाक्यांश का प्रयोग किया। यह वाक्यांश इस्राएल के परमेश्वर के लिए पुराने नियम में प्रयोग होनेवाले एक सामान्य नाम से आता है, जो है याहवे साबाओत (צְבָא֖וֹת יְהוָ֛ה)। इस तरह की भाषा तब काफ़ी अर्थपूर्ण लगती है यदि पत्री को प्राप्त करनेवालों का मजबूत यहूदी आधार हो।
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याकूब के पाठकों की पृष्ठभूमि को जानना बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह इस दिशा को जानने में हमारी सहायता करता है कि कैसे उस संदेश को समझा जाए जो वह अपने पाठकों को देने का प्रयास कर रहा है... यहूदी समुदाय के रूप में याकूब के पाठक मूसा की तोराह, भविष्यवक्ताओं और इतिहास के संदेश की एक लंबी परंपरा को प्राप्त करनेवाले लोग थे... जब याकूब उनसे विश्वास के जीवन, बुद्धिमानी पूर्ण जीवन के बारे में बात करता है तो वह इसी समृद्ध परंपरा पर आधारित होता है। और उन्हें समझने की आवश्यकता है कि कैसे उन्हें यीशु मसीह के पुनरुत्थान के प्रकाश में इसे अपने जीवनों में लागू करना चाहिए।
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— डॉ. स्कॉट रेड
अब, जब हम कहते हैं कि याकूब यहूदी मसीहियों को पत्री लिख रहा था, तो हमारे कहने का यह अर्थ नहीं है कि उन कलीसियाओं में अन्यजातियों से आए विश्वासी नहीं थे जिन्हें याकूब ने संबोधित किया था। प्रेरितों के काम 8 के समय से ही हम एक कूश देश के अधिकारी के विश्वास में आने के बारे में जानते हैं। और, जैसा कि हम प्रेरितों के काम 10 में देखते हैं, अन्यजाति से आए परमेश्वर का भय माननेवाले ऐसे बहुत से लोग थे जिन्होंने यहूदी धर्म अपना लिया था तथा आराधनालयों में शामिल होते थे। अतः यह कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी कि इन कलीसियाओं में अन्यजाति के कुछ विश्वासी हों। पर फिर भी, रोमियों 9:8 के अनुसार अन्यजाति के विश्वासियों को "अब्राहम का वंश" माना गया। और बिल्कुल उचित रूप में उन्हें इस्राएल के बारह गोत्रों का उतना ही भाग माना जाता था जितना कि लहू के रिश्ते से जुड़े यहूदियों को।
042
हम पत्री के लेखक और इसके मूल पाठकों पर ध्यान देने के द्वारा याकूब की पत्री की पृष्ठभूमि को देख चुके हैं। अब हम इसके लिखे जाने के अवसर की जाँच करने के लिए तैयार हैं।
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हम याकूब की पत्री के लिखे जाने के अवसर की खोज तीन चरणों में करेंगे। पहला, हम लेखक और पाठकों दोनों के स्थान का अध्ययन करेंगे। दूसरा, हम इसके लिखे जाने के समय पर विचार करेंगे। तीसरा, हम याकूब की पत्री के उद्देश्य के बारे में सोचेंगे। आइए इस पत्र के पाठकों और लेखक दोनों के स्थान पर ध्यान देते हुए आरंभ करें।
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लेखक के स्थान को समझना कठिन नहीं है। नया नियम और आरंभिक कलीसिया के धर्माध्यक्ष दोनों ही सुझाव देते हैं कि याकूब ने अपनी सेवकाई का जीवन यरूशलेम में बिताया। और वह 62 ईस्वी में अपनी शहादत तक यरूशलेम में ही रहा। इसलिए ऐसा सोचने का कोई कारण नहीं है कि उसने अपने पत्र को किसी और स्थान से लिखा हो।
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मूल पाठकों का स्थान भी कुछ सीमा तक स्पष्ट दिखाई देता है। जैसा कि हमने अभी देखा है, संभावना यह है कि पत्री के प्राप्तकर्ता ऐसे यहूदी विश्वासी थे जो स्तिफनुस की हत्या के बाद पूरे यहूदिया और सामरिया में तितर-बितर हो गए थे। प्रेरितों के काम 11:19 हमें बताता है कि ये विस्थापित विश्वासी रहने के सुरक्षित स्थान की खोज में बढ़ते-बढ़ते फीनीके, अंताकिया और साइप्रस तक चले गए थे। हम आश्वस्त नहीं हो सकते कि याकूब ने केवल इन्हीं स्थानों के विश्वासियों के लिए पत्र लिखा था। फिर भी, याकूब के आरंभिक अभिवादन "उन बारहों गोत्रों को जो तितर-बितर होकर रहते हैं," के आधार पर ये क्षेत्र याकूब के मूल पाठकों का स्थान होने की मजबूत संभावना रखते हैं।
046
हम सचमुच यह मानते हैं कि ये वास्तव में तितर-बितर हुए गोत्र थे। अर्थात् यरूशलेम के विश्वासी जो स्तिफनुस की शहादत के बाद आए सताव के कारण फीनिके और साइप्रस और अंताकिया में तितर-बितर हो गए थे। मेरे विचार से इस बात की संभावना बहुत अधिक है कि याकूब वास्तव में इन लोगों को अपनी कलीसिया के विश्वासियों के रूप में लिख रहा हो। और मैं ऐसा इसलिए सोचता हूँ कि बड़ी हैरानी की बात है वह हमें कोई धर्मविज्ञान नहीं देता या कुछ भी खुलकर नहीं कहता; वह सुसमाचार की संरचना के आधार पर बात नहीं करता। ऐसी काफ़ी बातें हैं जिनका वह उल्लेख नहीं करता, और एक पास्टर होने के नाते मैं सोचता हूँ कि शायद उसने उन बातों को अपनी सेवकाई में पहले ही बता दिया हो, और अब वह अपने परिचित पाठकों से ऐसे बात कर रहा है जैसे कि एक पास्टर करता है... और इसलिए इसका याकूब के प्रति हमारे भाव पर बहुत प्रभाव पड़ता है, कि हम इन तितर-बितर हुए पाठकों को ऐसे देखें जो पहले से ही उसकी सेवकाई के अधीन थे, और हम उसे इस रूप में उन्हें बढ़ाते हुए देखें।
047
— डॉ. माईकल केनीसन
याकूब की पत्री के अवसर के इस पहले पहलू — लेखक और पाठकों का स्थान — को ध्यान में रखते हुए, आइए अब हम पत्र के लिखे जाने के समय पर ध्यान दें।
048
इस पत्री के लेखन के संभावित शुरूआती और आखिरी समय का पता लगाना काफ़ी आसान है। पहला, पत्र की रचना का शुरूआती संभावित समय 44 ईस्वी है। हम जानते हैं कि याकूब ने इस पत्री को यरूशलेम की आरंभिक कलीसिया के एक अगुवे के रूप में लिखा था। प्रेरितों के काम 12:17 दर्शाता है कि पतरस के बंदीगृह से छुटकारे के समय तक याकूब यरूशलेम की कलीसिया का एक महत्वपूर्ण अगुवा बन गया था। प्रेरितों के काम 12:19-23 के अनुसार पतरस तब बंदीगृह से छूटा था जब 44 ईस्वी में हेरोदेस अग्रिप्पा I की मृत्यु हुई थी। यह इस संभावना को व्यक्त करता है कि पत्री इस समय से बहुत पहले नहीं लिखी गई थी।
049
दूसरा, पत्र की रचना का आखिरी संभावित समय 62 ईस्वी है, अर्थात् वह वर्ष जब याकूब शहीद हुआ था। जैसा कि हमने पहले देखा था, जोसेफस के अनुसार याकूब याजक हन्ना के हाथों इसी समय के आस-पास मारा गया था। यह इस पत्री की रचना के समय के विषय में एक संक्षिप्त समयावधि को दर्शाता है।
050
पत्री एतिहासिक घटनाओं के विशेष उल्लेखों को सम्मिलित नहीं करती जो इसके समय को अधिक सटीकता से बता सकते थे। परंतु यह सोचने के कम से कम दो कारण हैं कि रचना का समय बाद का होने की अपेक्षा पहले का है।
051
पहला, जैसे कि हमने पहले बताया था, पद 2:2 में याकूब ने अपने पाठकों की सभाओं का वर्णन करने के लिए सुनागोग (συναγωγη) या "आराधनालय" शब्द का प्रयोग किया था।
052
शब्द "आराधनालय" का प्रयोग मसीही आंदोलन के विकास की आरंभिक अवस्था को दिखाता प्रतीत होता है। याकूब ने मसीहियों को आराधनालयों से बाहर निकाले जाने से पहले लिखा होगा। या फिर, जिसकी संभावना बहुत कम है, उसने उस समय लिखा जब मसीही अपनी सभाओं को अभी तक “आराधनालय” ही कह रहे थे।
053
इसके अतिरिक्त, याकूब की पत्री में यहूदियों और अन्यजातियों के बीच के उन विवादों का उल्लेख नहीं मिलता जिन पर पतरस और पौलुस के लेखों में काफ़ी ध्यान दिया गया है।
054
आरंभिक कलीसिया में, जब अन्यजाति के लोगों ने बड़ी संख्या में मसीह पर विश्वास किया, तो इस बात को लेकर मतभेद हो गए कि क्या इन नए विश्वासियों को यहूदी परंपराओं का पालन करना चाहिए या नहीं। हो सकता है कि याकूब ने इन विवादों के बारे में बात न ही करना ठीक समझा हो। परंतु अधिक संभावना यह है कि वे अब तक उन नई कलीसियाओं के जीवन के मुख्य भाग नहीं बनी थीं जिन्हें याकूब ने संबोधित किया था।
055
इस पत्री के अवसर को इसके स्थान और इसके समय के आधार पर देख लेने के बाद, आइए हम इस पत्री को लिखने में याकूब के उद्देश्य की जाँच करें।
056
याकूब की पत्री के व्यापक उद्देश्य को सारगर्भित करने का एक सबसे महत्वपूर्ण तरीका याकूब 1:2-4 को देखना है। अपने आरंभिक शब्दों में याकूब ने अपने पाठकों से यह कहा :
057
हे मेरे भाइयो, जब तुम नाना प्रकार की परीक्षाओं में पड़ो, तो इसको पूरे आनंद की बात समझो, यह जानकर कि तुम्हारे विश्वास के परखे जाने से धीरज उत्पन्न होता है। पर धीरज को अपना पूरा काम करने दो कि तुम पूरे और सिद्ध हो जाओ, और तुम में किसी बात की घटी न रहे (याकूब 1:2-4)।
058
जैसे कि यह अनुच्छेद दर्शाता है, याकूब के पाठक कई तरह की परीक्षाओं का सामना कर रहे थे। परंतु याकूब ने उन्हें अपनी परीक्षाओं में पवित्र आनंद को रखने की बुलाहट दी। उसने समझाया कि परीक्षाएँ धीरज को उत्पन्न करती हैं। और जिनके पास धीरज है, वे पूरे और सिद्ध हो जाएँगे, और उन में किसी बात की घटी न रहेगी। परंतु याकूब के संदेश की मुख्य बात ठीक इसके अगले पद में आती है। पद 5 में याकूब ने इन शब्दों के साथ अपने विचारों को पूरा किया :
059
पर यदि तुम में से किसी को बुद्धि की घटी हो तो परमेश्वर से माँगे, जो बिना उलाहना दिए सब को उदारता से देता है, और उसको दी जाएगी। (याकूब 1:5)।
060
इस अध्याय में आगे हम इन पदों पर और अधिक विवरण के साथ चर्चा करेंगे। परंतु अभी, यह अनुच्छेद हमें इस पूरे पत्र के केंद्र की एक झलक देता है। परीक्षाओं के मध्य पूरे आनंद का अनुभव लेने के लिए परमेश्वर से बुद्धि “मांगें,” और यह “उसको दी जाएगी।” इस बात को ध्यान में रखते हुए, हम याकूब के पत्र के मुख्य उद्देश्य को इस प्रकार सारगर्भित कर सकते हैं :
061
याकूब ने अपने पाठकों से परमेश्वर की ओर से मिलनेवाली बुद्धि को पाने को कहा ताकि उन्हें अपनी परीक्षाओं में आनंद प्राप्त हो।
062
याकूब के पाठकों के लिए इस संदेश को सुनना महत्वपूर्ण था। जैसा कि हमने पहले कहा था, याकूब के पाठक अब फिलिस्तीन में नहीं रह रहे थे। वे "जातियों में तितर-बितर" होकर अपने घरों से दूर रह रहे थे। निस्संदेह, इनके लिए अपनी परीक्षाओं में आनंद को प्राप्त करना आसान नहीं था। ऐसा प्रतीत होता है कि इस कारण उनमें से कुछ ने मसीह के प्रति अपनी विश्वासयोग्यता को त्याग दिया था। इसकी अपेक्षा, वे उसका अनुसरण कर रहे थे जिसे याकूब "संसार से मित्रता" का नाम देता है। याकूब 4:4 को सुनिए जहाँ याकूब ने इन शक्तिशाली शब्दों को प्रयोग किया :
063
हे व्यभिचारिणियो, क्या तुम नहीं जानतीं कि संसार से मित्रता करनी परमेश्वर से बैर करना है? अत: जो कोई संसार का मित्र होना चाहता है, वह अपने आप को परमेश्वर का बैरी बनाता है (याकूब 4:4)।
064
स्पष्ट है कि याकूब के पाठकों में कुछ ऐसे लोग थे जो विश्वास से बहुत दूर हो गए थे। और याकूब ने उन्हें चेतावनी दी कि संसार से मित्रता ने उन्हें "परमेश्वर का बैरी" बना दिया था।
065
इसलिए इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि याकूब ने कलीसिया के एक अगुवे के रूप में अपने अधिकार का प्रयोग किया। याकूब ने उसके पाठकों को बार-बार यह आज्ञा दी कि वे विश्वास के सच्चे अंगीकार के साथ मेल खाता हुआ जीवन बिताएँ। उसने अपने 108 पदों में 50 से अधिक आदेशात्मक कथनों या प्रत्यक्ष आज्ञाओं का प्रयोग किया। और उसने अक्सर ऐसे अन्य व्याकरणीय रूपों का प्रयोग किया जिन्होंने अपने संदर्भों में आदेशात्मक कथनों के समान ही कार्य किया।
066
परंतु अपने पाठकों की समस्याओं के लिए याकूब का मुख्य समाधान उन्हें यह या वह करने की आज्ञा देना ही नहीं था। उसके लिए विषय का केंद्र यह था कि उन्हें परमेश्वर की ओर से मिली बुद्धि का अनुसरण करना था। बहुत सी परीक्षाओं को सहने के दौरान आनंद प्राप्त करने की मुख्य कुंजी परमेश्वर की ओर से मिलनेवाली बुद्धि थी। पद 4:8-10 के जाने-पहचाने शब्दों को सुनिए जहाँ याकूब ने अपने पाठकों से यह कहा :
067
परमेश्वर के निकट आओ तो वह भी तुम्हारे निकट आएगा... प्रभु के सामने दीन बनो तो वह तुम्हें शिरोमणि बनाएगा (याकूब 4:8-10)।
068
याकूब ने विश्वासियों को निर्देश दिया कि वे स्वयं को परमेश्वर के सामने दीन बनाएँ ताकि परमेश्वर उन्हें शिरोमणि बनाए। उसने सिखाया कि परमेश्वर के सामने दीन बनना ही बुद्धि का मार्ग है। और जब मसीह के अनुयायी विनम्र समर्पण के साथ परमेश्वर के निकट आते हैं तो जो बुद्धि वे प्राप्त करते हैं, वह परीक्षाओं के बीच धीरज धरने के समय आनंद लेकर आती है।
069
याकूब की पत्री के परिचय में अब तक हमने याकूब की पृष्ठभूमि को देखा है। अब हम इस पत्री की सरंचना और विषय-वस्तु को जाँचने के लिए तैयार हैं।
070
हमने अभी यह सुझाव दिया है कि याकूब की पत्री परीक्षा के समय में आनंद को प्राप्त करने के तरीके के रूप में बुद्धि पर बहुत ध्यान केंद्रित करती है। परंतु बुद्धि पर दिया गया यह बल इस पुस्तक के उद्देश्य से बढ़कर और भी बहुत कुछ को समझने में हमारी सहायता करता है। बहुत से व्याख्याकारों ने याकूब की पत्री को नए नियम की बुद्धि की पुस्तक कहा है। और यह दृष्टिकोण इस पत्री की असामान्य सरंचना और विषय-वस्तु को समझने में भी हमारी सहायता करता है।
071
जिस समय याकूब ने इस पत्र को लिखा, उस समय तक पुराने नियम से निकले बुद्धि साहित्य का एक लंबा इतिहास रहा था। पुराने नियम के बुद्धि साहित्य में अय्यूब और सभोपदेशक, और नीतिवचन की पुस्तक, तथा बुद्धि के भजन और भविष्यवाणी-संबंधी बुद्धि के कथन सम्मिलित हैं। इस पुराने नियम के साहित्य के प्रति याकूब का आभार कई रूपों में स्पष्ट है। उदाहरण के लिए, पद 5:11 में याकूब ने धीरज को बढ़ाने के लिए अय्यूब के उदाहरण का प्रयोग किया है, जो अय्यूब की पुस्तक का मुख्य चरित्र था। इससे बढ़कर, याकूब ने बोल-चाल, विधवाओं और अनाथों के प्रति व्यवहार, गरीबी और पक्षपात आदि जैसे विषयों पर भी बात की। ये विषय नीतिवचन की पुस्तक की विषय-वस्तु से मिलती-जुलती कई बातों को प्रकट करते हैं।
072
जब हम याकूब की पत्री को पढ़ते हैं, तो शब्द “बुद्धि” उसमें पिरोए एक धागे के रूप में हमें दिखाई देती है। वह स्पष्ट रूप से बुद्धि को बहुत महत्व देता है — संसार से मिलनेवाले ज्ञान की अपेक्षा परमेश्वर से मिलनेवाली बुद्धि को। और बुद्धि को दिया गया वह महत्व और पत्री की सरंचना हमें सोचने पर मजबूर करती है कि उसके जीवन पर बुद्धि साहित्य का बहुत प्रभाव रहा है। अब, मेरे विचार से हम यह उसके उद्धरणों तथा नीतिवचन की पुस्तक के उसके प्रयोग में स्पष्टता से देखते हैं, और साथ ही इसमें भी कि कैसे वह हमारे प्रभु यीशु के शब्दों को याद रखता है जिसने अक्सर बुद्धि के संदर्भ में बात की है... इसी के साथ-साथ, पुराने और नए नियम के बीच के समय के दौरान बुद्धि के विचार और बुद्धि के लेखनकार्य, जो कि बुद्धि साहित्य की एक शैली थी, का विकास हुआ था। और मेरे विचार में हम याकूब में बुद्धि साहित्य के कुछ ऐसे ही विषयों को देखते हैं। कभी-कभी हम समान सरंचना को देखते हैं। परंतु मैं सोचता हूँ कि बहुत से विषय वास्तव में नीतिवचन की पुस्तक और यीशु के साथ शुरू हुए थे और इसलिए मेरे विचार से याकूब पर बड़ा प्रभाव शायद यीशु और नीतिवचन का रहा होगा। परंतु दूसरे मंदिर के दौरान, यीशु के जीवनकाल के आस-पास के यहूदी धर्म के समय में वह शैली और नीतिवचन-संबंधी बुद्धि साहित्य का महत्व भी याकूब के लिए भी बहुत मायने रखता है।
073
— डॉ. डेविड डब्ल्यू. चैपमैन
याकूब की पत्री के साथ ही पवित्रशास्त्र से बाहर की प्रभावशाली पुस्तकें जैसे सीराख का बुद्धि साहित्य, जिसे सामान्यतः सीराख के नाम से भी जाना जाता है, और सुलैमान के बुद्धि साहित्य की पुस्तकों की विषय-वस्तु को भी दर्शाती है। ये पुस्तकें याकूब के दिनों में बहुत प्रचलित थीं, और उसके पत्र में उनके साथ बहुत सी समानताएँ हैं। एक उदाहरण के रूप में, सीराख के 1:26 में हम यह पढ़ते हैं :
074
यदि तू बुद्धि चाहता है, तो आज्ञाओं को मान और प्रभु तुझे यह दे देगा।
075
और याकूब 1:5 हमें यह बताता है :
076
पर यदि तुम में से किसी को बुद्धि की घटी हो तो परमेश्वर से माँगे, जो बिना उलाहना दिए सब को उदारता से देता है, और उसको दी जाएगी (याकूब 1:5)।
077
इस तरह के बुद्धि साहित्य के अतिरिक्त, सुसमाचारों में लिखे यीशु के बहुत से निर्देश इस्राएल के बुद्धि साहित्य की शिक्षाओं के अनुरूप थे। और व्याख्याकारों ने याकूब के लेखनों और यीशु के निर्देशों में कई समानताओं को देखा है। उदाहरण के लिए, मत्ती 5:10 पर ध्यान दें जहाँ यीशु ने यह कहा :
078
धन्य हैं वे, जो धार्मिकता के कारण सताए जाते हैं, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है (मत्ती 5:10)।
079
इसकी तुलना याकूब 1:12 से करें जहाँ याकूब ने यह लिखा :
080
धन्य है वह मनुष्य जो परीक्षा में स्थिर रहता है, क्योंकि वह खरा निकलकर जीवन का वह मुकुट पाएगा जिसकी प्रतिज्ञा प्रभु ने अपने प्रेम करनेवालों से की है (याकूब 1:12)।
081
पहली सदी और उससे थोड़ा पहले के यहूदीवादी बुद्धि साहित्य का याकूब पर बहुत प्रभाव था, विशेष रूप से सांस्कृतिक और साहत्यिक परिवेश में जिसमें वह कार्य कर रहा था। वास्तव में, पुराने नियम और यहूदियों के अन्य साहित्य में याकूब और दूसरे साहित्य के बीच बहुत से उल्लेख और समानताएँ हैं। आप जानते हैं कि याकूब नीतिवचन से दो बार उद्धृत करता है, कम से कम एक बार या शायद दो बार, और उसने विशेष रूप से यीशु बेन सीराख से बहुत से उल्लेख लिए हैं, जो नए नियम के समय से लगभग एक सदी पहले लिखा गया था...परंतु बुद्धि के संदर्भ में एक बात है जो केवल याकूब में है, वह यह है कि याकूब अपनी बुद्धि को बड़ी गहराई से यीशु की शिक्षाओं से जोड़ता है... याकूब शायद नए नियम का सबसे रंगीला व्याख्याकार है जो छोटी पतवारों के द्वारा चलाए जानेवाले जहाजों, धीरज के साथ प्रतीक्षा करनेवाले किसानों, और यात्रा करनेवाले व्यापारियों को चित्रित करता है। उसमें अनेकों उदाहरण हैं। यह सब बुद्धि साहित्य का प्रभाव है। परंतु याकूब की विषय-वस्तु वास्तव में इस प्रकार आगे बढ़ती है जिसमें यीशु राज्य को प्रस्तुत करता है और किस प्रकार वह उपस्थिति आपके जीवन को परिवर्तित कर देती है।
082
— डॉ. डान मैक्कार्टनी
बुद्धि साहित्य के साथ याकूब के घनिष्ठ संबंध के कारण इस पत्री की सरंचना उससे बहुत अलग है जिसकी हम अपेक्षा करते हैं । इस पत्र को संक्षिप्त रूप से देखना ही हमें बताता है कि इसका संगठन सरल नहीं है। वास्तव में, हमारे आधुनिक दृष्टिकोण से यह बड़ा अव्यवस्थित दिखाई दे सकता है। नीतिवचन की पुस्तक के समान ही याकूब की पुस्तक कई महत्वपूर्ण विषयों के बारे में बात करती है। और अक्सर वह किसी एक विषय के बारे में कुछ पद लिखकर दूसरे विषय की ओर आगे बढ़ जाती है। कभी कभी यह पत्र में आगे एक या अधिक विषयों की ओर मुड़ता है, परंतु बिना किसी संगतता के। कुछ व्याख्याकारों ने यह निष्कर्ष भी निकाला है कि याकूब के पत्र में कोई सरंचना नहीं है। उनका मानना है कि यह केवल बुद्धि की बातों का संकलन मात्र है जिसमें कोई वास्तविक क्रम या विचारों का बहाव नहीं है।
083
परंतु हमें यहाँ सावधान रहना होगा। यह पत्र बिना किसी क्रम के एक साथ रखे गए असंबंधित पदों की अव्यवस्थित खिचड़ी नहीं है। यद्यपि याकूब की पत्री अपनी सरंचना और विषय-वस्तु में बुद्धि साहित्य जैसी प्रतीत होती है, फिर भी वह कई रूपों में उस शैली से भिन्न भी है। अन्य बुद्धि साहित्य के विपरीत, याकूब की पत्री विशेष कलीसियाओं को लिखी गई है। और इसी कारण, यह नए नियम की कई अन्य पत्रियों के कुछ संगठनात्मक गुणों को दर्शाती है।
084
याकूब की पत्री के संगठन या सरंचना के विषय पर व्याख्याकारों में सहमति नहीं है। परंतु इस अध्याय के उद्देश्यों के लिए हमने इस पुस्तक को सात खंडों में विभाजित किया है।
085
- याकूब 1:1 में यह पत्री याकूब के अभिवादन से शुरू होती है।
- याकूब 1:2-18 में पहला मुख्य विभाजन इस पुस्तक के मुख्य विषयों का परिचय है जिसे हम बुद्धि और आनंद कह सकते हैं।
- याकूब 1:19-2:26 में दूसरा मुख्य विभाजन बुद्धि और आज्ञाकारिता के प्रति याकूब के दृष्टिकोण को व्यक्त करता है।
- याकूब 3:1-4:12 में तीसरा मुख्य विभाजन मसीही समाज में बुद्धि और शांति को दर्शाता है।
- याकूब 4:13-5:12 में चौथा मुख्य विभाजन बुद्धि और भविष्य पर ध्यान केंद्रित करता है।
- याकूब 5:13-18 में चौथा और पाँचवाँ मुख्य विभाजन उसके लिए समर्पित है जिसका वर्णन हम बुद्धि और प्रार्थना के रूप में कर सकते हैं।
- इन पाँच मुख्य विभाजनों के बाद 5:19 और 20 में एक अंतिम उपदेश है।
आइए हम याकूब 1:1 में अभिवादन के साथ आरंभ करके इनमें से प्रत्येक विभाजन को गहराई से देखें।
086
एक बार फिर से याकूब 1:1, अर्थात् याकूब के संक्षिप्त अभिवादन को सुनें :
087
परमेश्वर के और प्रभु यीशु मसीह के दास याकूब की ओर से उन बारहों गोत्रों को जो तितर-बितर होकर रहते हैं नमस्कार पहुँचे (याकूब 1:1)।
088
हमें यह देखने से नहीं चूकना चाहिए कि याकूब ने अपना वर्णन यहाँ किस प्रकार किया। उसने स्वयं को "परमेश्वर के और प्रभु यीशु मसीह के दास" के रूप में दर्शाया। याकूब अपना परिचय कलीसिया के अगुवे, या यीशु के भाई के रूप में भी दे सकता था। इसकी अपेक्षा, उसने इस बात पर बल देने को चुना कि वह परमेश्वर का और मसीह का दास था। यह दोहरा उल्लेख शायद याकूब की नम्रता का व्यक्तिगत कथन हो, अर्थात् ऐसा विषय जिसका उल्लेख उसने आगे पुस्तक में किया। यहाँ उसने इस बात को स्पष्ट करने के द्वारा नम्रता का उदाहरण दिखाया कि वह अपने भाई यीशु का दास था।
089
इस अभिवादन के बाद, पहला मुख्य विभाजन उस पर ध्यान देता है जिसे हम बुद्धि और आनंद कहते हैं।
090
याकूब ने अपनी पत्री उन मसीहियों को लिखी जो यरूशलेम से खदेड़ दिए गए थे और भूमध्यसागरीय संसार में तितर-बितर हो गए थे। वे कई तरह की परीक्षाओं का सामना कर रहे थे जिन्होंने निस्संदेह उन्हें निरुत्साहित कर दिया था। और इसी कारण बुद्धि के महत्व के विषय में याकूब के पहले शब्द आनंद की बुलाहट के साथ आरंभ होते हैं। याकूब 1:2 को फिर से सुनिए जहाँ याकूब ने अपने पाठकों से यह कहा :
091
हे मेरे भाइयो, जब तुम नाना प्रकार की परीक्षाओं में पड़ो, तो इसको पूरे आनंद की बात समझो (याकूब 1:2)।
092
यह अनुच्छेद हमें विचित्र लग सकता है, विशेषकर इसलिए क्योंकि यह उन लोगों को संबोधित है जो "नाना प्रकार की परीक्षाओं" का सामना कर रहे थे। परंतु याकूब द्वारा परीक्षाओं को "पूरे आनंद" की बात समझने का आग्रह उतना असामान्य नहीं है जितना कि हम सोचते हैं।
093
वाक्याँश "पूरा आनंद" यूनानी अभिव्यक्ति पासान खारान (πᾶσαν χαρὰν) से आता है, जिसका अनुवाद "पूरे, असीमित आनंद" के रूप में किया जा सकता है। ऐसा प्रोत्साहन याकूब के समय में पाए जानेवाले अन्य बुद्धि साहित्य के साथ उपयुक्त बैठता है। कई बार, बुद्धि साहित्य ने उन लोगों को प्रोत्साहित किया जो स्वयं को आशीषित मानने के लिए दुःख उठाते थे। उदाहरण के लिए, यीशु ने मत्ती 5:12 में धन्य वचनों को सताव के बीच "आनंदित और मगन" होने की बुलाहट के साथ समाप्त किया।
094
जैसा कि हमने पहले कहा था, पद 1:3-4 में याकूब ने सिखाया कि परीक्षाओं में रखा गया धीरज विश्वासियों को "पूरा और सिद्ध" बनाता है। दूसरे शब्दों में, जब परमेश्वर के लोग कठिनाइयों का सामना करते हैं, तो वे उन सब बातों की पूर्णता में बढ़ते हैं जो परमेश्वर ने उनके लिए रखी हैं। परंतु वास्तविकता में, अच्छे से अच्छे विश्वासी के लिए भी अक्सर यह देखना बहुत कठिन होता है कि कष्टों के बीच यह कैसे हो सकता है। इसीलिए अगले ही पद में याकूब ने अपने पाठकों को परमेश्वर से मिलनेवाली बुद्धि का अनुसरण करने के लिए कहा। आपको स्मरण होगा कि याकूब 1:5 यह कहता है :
095
पर यदि तुम में से किसी को बुद्धि की घटी हो तो परमेश्वर से माँगे, जो बिना उलाहना दिए सब को उदारता से देता है (याकूब 1:5)।
096
वे जो परीक्षाओं का सामना करते हुए पूरे आनंद को पाना चाहते हैं, उन्हें परमेश्वर से अंतर्दृष्टि माँगनी चाहिए। उन्हें इस बात को समझने में बुद्धि की आवश्यकता होती है कि कैसे उनकी परीक्षाएँ बेहतरी की ओर उनका मार्गदर्शन करती हैं। और यदि हम परमेश्वर से ऐसी बुद्धि को मांगते हैं तो वह हमें यह दे देगा। जैसा कि याकूब 1:17 में कहता हुआ आगे बढ़ता है, परमेश्वर अपने लोगों को भले और उत्तम दान देता है। याकूब इस आश्वासान के साथ 1:18 में इस खंड को समाप्त करता है :
097
[परमेश्वर} ने अपनी ही इच्छा से हमें सत्य के वचन के द्वारा उत्पन्न किया, ताकि हम उसकी सृष्टि की हुई वस्तुओं में से एक प्रकार के प्रथम फल हों (याकूब 1:18)।
098
जब हम यह समझने के लिए बुद्धि को प्राप्त करते हैं कि परमेश्वर कैसे परीक्षाओं के द्वारा कार्य करता है, तो हम आनंद से भर सकते हैं। बुद्धि हमारे इस भरोसे को मजबूत करती है कि परमेश्वर ने हमारे लिए अनंत उद्धार की आशीष को नियुक्त किया है।
099
बुद्धि और आनंद के विषय पर चर्चा के बाद, याकूब बुद्धि और आज्ञाकारिता के बीच के संबंध की ओर बढ़ता है।
100
बुद्धि और आज्ञाकारिता (1:19‑2:26)
इस खंड में, याकूब ने तीन मूलभूत चरणों में बुद्धि और आज्ञाकारिता पर चर्चा की। सबसे पहले, पद 1:19-27 केवल सुनने या बात करने की अपेक्षा कर्म करने के महत्व को बताता है।
101
पद 1:22 में हम यह पढ़ते हैं :
102
वचन पर चलनेवाले बनो, और केवल सुननेवाले ही नहीं जो अपने आप को धोखा देते हैं (याकूब 1:22)।
103
वचन को सुनना मात्र ही पर्याप्त नहीं है। परमेश्वर की ओर से आए बुद्धि के वचनों से विश्वासयोग्य आज्ञाकारिता की ओर अगुवाई मिलनी चाहिए। अन्यथा, हम अपने आप को धोखा दे रहे हैं।
104
जब आप याकूब की पत्री को पढ़ते हैं तो समझ जाते हैं कि वह वास्तव में उन बातों को व्यवहार में लाने की आवश्यकता पर बल दे रहा है जिन पर विश्वास करने की बात हम कहते हैं। यह पूरी पत्री में एक बहुत ही मुख्य विषय है। हमें यह प्रश्न पूछने की आवश्यकता है, याकूब उस पर बल क्यों दे रहा है? और पहला उत्तर यह प्रतीत होता है, याकूब एक वास्तविक संसार में रहता है, वह वास्तविक लोगों के बीच सेवा करता है, और जिस संसार में हम रहते हैं वहाँ बातों का कोई मूल्य नहीं होता, जहाँ यह कहना बहुत आसान है कि हम परमेश्वर पर विश्वास करते हैं और उस विश्वास को कर्म में प्रकट करना बहुत कठिन होता है। यह न केवल याकूब के लिए बल्कि यीशु के लिए भी एक चुनौती जान पड़ता है... बात करना कर्म करने के बराबर नहीं होता। यीशु यह जानता है। याकूब यह जानता है। वे वास्तविक संसार में वास्तविक समस्या के साथ वास्तविक लोगों तक पहुँचने की कोशिश कर रहे थे।
105
— डॉ. जिम्मी आगन
याकूब ने अपने पाठकों से अपेक्षा की कि वे परमेश्वर का वचन सुनने से अधिक कुछ करें। उसने उनसे अपेक्षा की कि वे अपने विश्वास को कर्म में प्रकट करें। यह विषय याकूब के लिए इतना महत्वपूर्ण था कि यद्यपि उसने अध्याय 1 और 2 में इस पर मुख्य रूप से चर्चा की थी, फिर भी अपनी पूरी पत्री में वह बार-बार इसकी ओर लौटता रहा। उदाहरण के लिए, पद 3:13 में बुद्धि और आज्ञाकारिता के बीच याकूब का मूल दृष्टिकोण फिर से प्रकट होता है। याकूब लिखता है :
106
तुम में ज्ञानवान और समझदार कौन है? जो ऐसा हो वह अपने कामों को अच्छे चालचलन से उस नम्रता सहित प्रगट करे जो ज्ञान से उत्पन्न होती है (याकूब 3:13)।
107
जैसे कि यह पद दर्शाता है, परीक्षाओं और दुखों में परमेश्वर के उद्देश्यों का ज्ञान और समझ केवल बौद्धिक विषय ही नहीं है। जिनके पास यह है वे इसे अपने अच्छे जीवन, और उस नम्रता में किए गए अच्छे कार्यों के द्वारा दिखाएँगे जो उन्हें परमेश्वर द्वारा दी गई बुद्धि से प्राप्त होती है।
108
अतः पद 1:27 में याकूब ने सच्ची पवित्रता, या निर्मल भक्ति को इस प्रकार सारगर्भित करने के द्वारा कर्म करने की जरूरत के इस खंड को समाप्त किया :
109
हमारे परमेश्वर और पिता के निकट शुद्ध और निर्मल भक्ति यह है कि अनाथों और विधवाओं के क्लेश में उनकी सुधि लें, और अपने आप को संसार से निष्कलंक रखें (याकूब 1:27)।
110
याकूब भक्ति के विषय में बड़े खुले रूप में बात करता है — जिसे वह "शुद्ध और निर्मल" कहता है — वह यह है : "अनाथों और विधवाओं के क्लेश में उनकी सुधि लें, और अपने आप को संसार से निष्कलंक रखें।" और हमारी इस संस्कृति में, जो अनेक रूपों में बहुत ही भौतिकवादी है, वे एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, एक तरीका जिसमें हम अशुद्ध बनते हैं, वह है अपने चारों ओर के गरीबों की देखभाल न करना, या उनकी गरीबी का कारण केवल उन्हें ही बताना, न कि उनके विधिवत कारणों को ढूँढना। इसका अर्थ यह है कि अपनी दृष्टि में हम श्रेष्ठ हैं, कि हम पर परमेश्वर की आशीष है और गरीबों पर नहीं है; परंतु वास्तविकता यह है कि हम अक्सर हम गरीबों के विश्वास को उनसे अधिक मजबूत और अधिकारपूर्ण पाते हैं जिन्होंने उनके जैसे कष्टों का सामना नहीं किया है।
111
— रेव्ह. डॉ. थुरमन विलियम्स
कर्म की इस परिचयात्मक बुलाहट का अनुसरण करते हुए याकूब ने 2:1-13 में पक्षपात की समस्या पर ध्यान देने के द्वारा बुद्धि और आज्ञाकारिता के बीच के संबंध का सविस्तार वर्णन किया।
112
ऐसा लगता है कि याकूब के पाठकों में से कुछ लोग धनवानों का पक्ष लेकर गरीबों की अनदेखी कर रहे थे। और इस खंड में याकूब ने उन्हें उसकी ओर उचित ध्यान देने की बुलाहट देने के द्वारा इस समस्या को संबोधित किया जिसे वह "राज व्यवस्था" कहता है। 2:8 में याकूब ने यह कहा :
113
यदि तुम पवित्रशास्त्र के इस वचन के अनुसार कि “तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख” सचमुच उस राज व्यवस्था को पूरी करते हो, तो अच्छा ही करते हो (याकूब 2:8)।
114
मूलभूत रूप से, धनवानों का पक्ष लेकर गरीबों की अनदेखी करना "अपने पड़ोसी से प्रेम करने" में असफल होना है। और याकूब ने सिखाया कि उन्हें राज व्यवस्था का पालन करने के द्वारा पक्षपात के पाप से बचना चाहिए।
115
हम धनवान और गरीब के साथ उनके संबंध के विषय में याकूब की शिक्षा में लूका 16 की उद्धारकर्ता की शिक्षा के वास्तविक प्रतिबिंब को देखते हैं। याकूब 2 में वह इस विषय में बात करता है कि क्या तुम नहीं जानते कि परमेश्वर ने कंगालों को चुना है, और कैसे वे जो उससे प्रेम करते हैं, उसके राज्य के उत्तराधिकारी होंगे... धनवान जब मसीही सभाओं में आते हैं तो उनका पक्ष लिया जाता है। उनके प्रति अधिक आदर दिखाया जाता है — "आप मेरी जगह पर बैठ सकते हैं; आप सभा में सबसे उत्तम जगह ले सकते हैं।" और याकूब ऐसा व्यवहार करनेवालों को यह याद रखने की चेतावनी देता है कि दरिद्रों का परमेश्वर के राज्य में पूरा अधिकार है, उन्हें पूरा उत्तराधिकार मिला है, और इसलिए उन्हें परमेश्वर के लोगों के बीच पूरा सम्मान और आदर तथा पूर्ण सदस्यता मिलनी चाहिए।
116
— डॉ. ग्रेग पैरी
जैसा कि हम देख चुके हैं, याकूब की पुस्तक का परमेश्वर की व्यवस्था पर बहुत ही सकारात्मक केंद्र है। याकूब के दृष्टिकोण में, व्यवस्था हमें एक दूसरे की देखभाल करना, गरीबों पर तरस खाना, पक्षपात से बचना इत्यादि बातें सिखाती है। परंतु यदि हम सावधान नहीं रहते तो इस सकारात्मक दृष्टिकोण का दुरूपयोग भी किया जा सकता है। आधुनिक मसीही अक्सर दर्शाते हैं कि कैसे परमेश्वर की व्यवस्था का प्रयोग परमेश्वर के सामने अपने धार्मिक कामों के द्वारा स्वयं को धर्मी ठहराने का व्यर्थ प्रयास करने में किया गया है। और हम परमेश्वर की व्यवस्था के इस दुरूपयोग को अस्वीकार करने में सही भी हैं। परंतु इसके विपरीत, याकूब की पुस्तक व्यवस्था के एक भिन्न पहलू पर बल देती है। याकूब ने सिखाया कि यद्यपि व्यवस्था के द्वारा कोई धर्मी नहीं ठहराया जा सकता है, पर फिर भी परमेश्वर की व्यवस्था हमारे लिए बुद्धि का स्रोत है। और हमें इसकी आज्ञाकारिता में जीना चाहिए। निस्संदेह हम व्यवस्था का पालन वैसे नहीं करते जैसे कि हम पुराने नियम के समय में रह रहे हों; हमें परमेश्वर की व्यवस्था को हमेशा मसीह और नए नियम की शिक्षाओं के प्रकाश में लागू करना चाहिए। परंतु जिन्होंने मसीह पर उद्धार के लिए भरोसा किया है, वे परमेश्वर के प्रति आभार-स्वरूप व्यवस्था का पालन करते हैं, क्योंकि यह परमेश्वर की बुद्धि का प्रकाशन है। इस भाव में, याकूब भजन 19:7 के भाव को दर्शाता है, जहाँ हम यह पढ़ते हैं :
117
यहोवा की व्यवस्था खरी है, वह प्राण को बहाल कर देती है; यहोवा के नियम विश्वासयोग्य हैं, साधारण लोगों को बुद्धिमान बना देते हैं (भजन 19:7।
118
बुद्धि के वचन और परमेश्वर की राज व्यवस्था का पालन करने के द्वारा पक्षपात का विरोध करने के प्रत्युत्तर में कर्म के महत्व को दर्शाने के बाद पद 2:14-26 में याकूब विश्वास और आज्ञाकारिता के बीच के संबंध को संबोधित करता है।
119
पद 2:14 में याकूब ने यह प्रश्न उठाया :
120
हे मेरे भाइयो, यदि कोई कहे कि मुझे विश्वास है पर वह कर्म न करता हो, तो इससे क्या लाभ? क्या ऐसा विश्वास कभी उसका उद्धार कर सकता है? (याकूब 2:14)
121
याकूब ने एक मजबूत "नहीं" के साथ इसका उत्तर दिया। उसने ऐसा कई रूपों में किया। पहला, उसने दर्शाया कि यहाँ तक कि शैतान भी परमेश्वर के बारे में सच्ची बातों को मानता है, परंतु इससे उसे कोई लाभ नहीं होता। फिर उसने दर्शाया कि कैसे अब्राहम का विश्वास उसे आज्ञाकारिता की ओर ले गया। और उसने वर्णन किया कि कैसे राहाब ने भले कर्मों के द्वारा अपने विश्वास को प्रदर्शित किया। इसलिए पद 2:26 में याकूब ने यह जाना-पहचाना निष्कर्ष निकाला :
122
अत: जैसे देह आत्मा बिना मरी हुई है, वैसा ही विश्वास भी कर्म बिना मरा हुआ है (याकूब 2:26)।
123
याकूब के अनुसार, सही मान्यताओं का होना ही पर्याप्त नहीं है। एक विश्वास जो स्वयं को आज्ञाकारिता में प्रकट नहीं करता है वह मरा हुआ है। वह एक उद्धार देनेवाला सच्चा विश्वास नहीं है।
124
अपने पाठकों को आज्ञाकारिता का जीवन जीने के प्रति उत्साहित करने के बाद, याकूब ने मसीह के अनुयायियों के बीच बुद्धि और शांति के संबंध पर ध्यान दिया।
125
पद 4:1 में याकूब के प्रश्न को सुनिए :
126
तुम में लड़ाइयाँ और झगड़े कहाँ से आ गए? (याकूब 4:1)
127
यद्यपि यह पद इस खंड के बीच में आता है, परंतु कई रूपों में यह पूरा खंड इसी प्रश्न से संबंधित है।
128
इस खंड में याकूब ने विश्वासियों के बीच बुद्धि और शांति से जुड़े तीन मुख्य विषयों पर ध्यान दिया। पहला, 3:1-12 में याकूब ने जीभ, या शब्दों के हमारे प्रयोग पर ध्यान दिया।
129
पद 3:4-5 में याकूब ने जीभ की तुलना जहाज की पतवार के साथ की। उसने इसे ऐसे स्पष्ट किया :
130
जहाज भी, यद्यपि ऐसे बड़े होते हैं और प्रचण्ड वायु से चलाए जाते हैं, तौभी एक छोटी सी पतवार के द्वारा माँझी की इच्छा के अनुसार घुमाए जाते हैं। वैसे ही जीभ भी एक छोटा सा अंग है और वह बड़ी-बड़ी डींगें मारती है (याकूब 3:4-5)।
131
फिर पद 6 में वह अपने पाठकों से यह कहते हुए आगे बढ़ा :
132
जीभ हमारे अंगों में अधर्म का एक लोक है, और सारी देह पर कलंक लगाती है, और जीवन-गति में आग लगा देती है, और नरक कुण्ड की आग से जलती रहती है (याकूब 3:6)।
133
जीभ की बुराई करने की क्षमता के विरुद्ध याकूब की चेतावनी बहुत कुछ उसके जैसी है जो हम नीतिवचन की पुस्तक में पाते हैं। नीतिवचन बहुत बार जीभ, या बोलने से संबंधित खतरों के बारे में बात करता है। हम इसे नीतिवचन 10:31; 11:12; 15:4 जैसे स्थानों और अन्य कई पदों में पाते हैं। याकूब और नीतिवचन दोनों ने दर्शाया कि शब्द परमेश्वर के लोगों के बीच कई तरह की परेशानियाँ उत्पन्न कर सकते हैं। संघर्ष से बचने और शांति के साथ जीवन जीने के लिए हमें अपनी जीभों पर नियंत्रण रखना होगा।
134
जब हम याकूब की पुस्तक की ओर आते हैं और हम अपनी बातचीत के विषय में उसको सुनते हैं, तो हमें शायद यीशु के वचन याद आते हैं, जब वह यह कहता है कि "जो मन में भरा है, वही मुँह पर आता है।" जैसे याकूब यीशु के इन वचनों पर मनन करता है और कलीसिया को निर्देश देता है — वैसे ही हमें भी किस प्रकार मसीह के आगमन और उसके भावी पुनरागमन की आशा के प्रकाश में जीवन जीना चाहिए — याकूब के अनुसार अपने हृदय को मापने का एक तरीका अपने शब्दों पर ध्यान केंद्रित करना है। दूसरे शब्दों में, याकूब एक व्यक्ति के शब्दों को, अर्थात् जीभ को जो कि शब्दों का सारांश है, एक व्यक्ति के संपूर्ण नैतिक अस्तित्व के मापदंड के रूप में देखता है। यह तापमान को दर्शाती है — या इसे ऐसे कहें कि यह एक व्यक्ति के हृदय का तापमान दर्शाती है। और इसलिए, जैसे यीशु कहता है, "जो मन में भरा है, वही मुँह पर आता है," वैसे ही जब याकूब कहता है कि एक व्यक्ति को अपनी जीभ पर लगाम लगानी चाहिए और एक ही मुँह से आशीष ओर श्राप दोनों नहीं निकलने चाहिए, तो वह हमसे कह रहा है कि हमारा हृदय परमेश्वर के प्रति पूरी तरह से समर्पित होना चाहिए। हमें दुचित्ते नहीं होना चाहिए, बल्कि हमें विश्वास के साथ मसीह की शिक्षा को थामे रहना चाहिए, और जब हम ऐसा करते हैं, तो शब्द हमारे भाइयों और बहनों को श्राप के बजाय आशीष देनेवाले होने चाहिए।
135
— डॉ. ब्रैंडन डी. क्रो
बुद्धि और शांति के साथ जुड़ा हुआ दूसरा विषय दो प्रकार के ज्ञान को दर्शाता है। हम 3:13-18 में इसे पाते हैं।
136
याकूब 3:14-17 में हम इन शब्दों को पढ़ते हैं :
137
पर यदि तुम अपने-अपने मन में कड़वी डाह और विरोध रखते हो तो... यह ज्ञान वह नहीं जो ऊपर से उतरता है, वरन् सांसारिक, और शारीरिक, और शैतानी है... पर जो ज्ञान ऊपर से आता है वह पहले तो पवित्र होता है फिर मिलनसार, कोमल और मृदुभाव और दया और अच्छे फलों से लदा हुआ और पक्षपात और कपट रहित होता है (याकूब 3:14-17)।
138
जैसा कि हम यहाँ देखते हैं, ज्ञान और शांति के बीच के संबंध को स्पष्ट करने के लिए याकूब ने सांसारिक, अर्थात् शैतानी एवं परमेश्वर की ओर से आनेवाले ज्ञान में अंतर स्पष्ट किया। सांसारिक ज्ञान कड़वी डाह, और स्वार्थ महत्वकांक्षा की ओर लेकर जाता है। परंतु परमेश्वर की ओर से आनेवाला ज्ञान मसीह समुदाय में शांति लेकर आता है।
139
याकूब ने अपने पाठकों से कहा कि वे अपने लड़ाई-झगड़े मिटा दें। उसने स्पष्ट किया कि जब हम स्वार्थी इच्छाओं पर बने रहते हैं तो हमारे बीच शांति नहीं हो सकती। उसने सिखाया कि सांसारिक ज्ञान "बखेड़ा और हर प्रकार का दुष्कर्म" उत्पन्न करता है। अतः याकूब ने अपने पाठकों को उस ज्ञान पर निर्भर रहने का निर्देश दिया जो परमेश्वर की ओर से आता है। जब हम ऐसा करते हैं, तो शांति को पाते हैं। जैसे कि याकूब 3:18 में लिखता है :
140
मिलाप कराने वाले धार्मिकता का फल मेलमिलाप के साथ बोते हैं (याकूब 3:18)।
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4:1-12 में पाए जानेवाले इस खंड में तीसरा विषय ज्ञान और शांति को उस आंतरिक संघर्ष के संबंध में देखता है जिसका अनुभव मसीह के अनुयायी करते हैं।
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याकूब ने मसीहियों के बीच स्वार्थी अभिलाषाओं, गलत उद्देश्यों और असंतोष के कारण झगड़ों को देखा। याकूब के दृष्टिकोण से उसके पाठकों की बुरी अभिलाषाओं ने मसीही समुदाय को बहुत क्षति पहुँचाई थी। वे अपनी अभिलाषाओं के अधीन थे। और इसी कारण वे लड़ रहे थे, और लालच कर रहे थे, और यहाँ तक कि एक दूसरे को नष्ट कर रहे थे। इसलिए याकूब ने बड़ी कड़ाई से उनसे कहा है कि शांति लाने के लिए उन्हें क्या करना चाहिए। 4:7-10 में याकूब यह कहता है :
143
इसलिये परमेश्वर के अधीन हो जाओ... परमेश्वर के निकट आओ तो वह भी तुम्हारे निकट आएगा... प्रभु के सामने दीन बनो तो वह तुम्हें शिरोमणि बनाएगा (याकूब 4:7-10)।
144
परमेश्वर के सामने केवल नम्रतापूर्ण समर्पण ही उनके लड़ाई-झगड़ों को ख़त्म करेगा और उन्हें एक दूसरे के साथ मेल-मिलाप प्रदान करेगा।
145
आइए अब हम बुद्धि और भविष्य के बीच के संबंध पर ध्यान दें।
146
बुद्धि और भविष्य पर आधारित याकूब के विचार-विमर्श को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है। पहला भाग पद 4:13-17 में पाया जाता है और उन लोगों के बारे में बताता है जो भविष्य की योजनाएँ ऐसे बना रहे थे मानो परमेश्वर के नियंत्रण में कुछ भी नहीं है।
147
ये वचन दर्शाते हैं कि याकूब के पाठकों में से बहुत से लोग अपनी भविष्य की योजनाओं को निर्धारित करने का प्रयास कर रहे थे। वे धन इकट्ठा करने पर ध्यान देते थे, और डींग मारते थे कि क्या करेंगे और कहाँ जाएँगे। इसके प्रत्युत्तर में याकूब ने उन्हें याद दिलाया कि उनके जीवन क्षणभुंगर थे। वे यह नहीं जान सकते थे कि भविष्य में उनके लिए क्या रखा है। पद 4:15-16 को सुनिए जहाँ याकूब ने उनसे यह कहा :
148
इसके विपरीत तुम्हें यह कहना चाहिए, “यदि प्रभु चाहे तो हम जीवित रहेंगे, और यह या वह काम भी करेंगे।” पर अब तुम अपने डींग मारने पर घमण्ड करते हो; ऐसा सब घमण्ड बुरा होता है (याकूब 4:15-16)।
149
केवल परमेश्वर भविष्य को नियंत्रित करता है और जो बुद्धिमान हैं, वे इसे स्वीकार करेंगे।
150
इस खंड के दूसरे भाग में याकूब ने थोड़े भिन्न रूप में बुद्धि और भविष्य पर ध्यान दिया। 5:1-6 में उसने भविष्य के न्याय के दिन के कारण धन के संचय के विरुद्ध चेतावनी दी।
151
याकूब ने कई जगहों पर गरीबों के प्रति व्यवहार के विषय में बहुत कुछ कहा। और उसने गरीबों का शोषण करने के लिए बार-बार धनवानों की निंदा की। इन पदों में याकूब ने बड़ी कठोरता से उन धनवानों को चेतावनी दी जिन्होंने गरीबों का शोषण करके धन संचय किया था। और उसने उन्हें बताया कि वे शीघ्र ही उसके कारण दुःख उठाएँगे। जैसे कि वह 5:3 में लिखता है :
152
तुम्हारे सोने-चाँदी में काई लग गई है; और वह काई तुम पर गवाही देगी, और आग के समान तुम्हारा मांस खा जाएगी। तुम ने अन्तिम युग में धन बटोरा है (याकूब 5:3)।
153
जैसे कि यह अनुच्छेद दर्शाता है, दूसरों का शोषण करके धन का संचय करना कड़ा दंड लेकर आएगा।
154
याकूब मूल रूप से जो कह रहा है वह कुछ ऐसा है जिसने उसके सुननेवाले बहुत से यहूदियों को हिला कर रख दिया होगा। वह मूल रूप से धनवानों और गरीबों के बीच के संबंध की उस समझ को उलट देता है जो इस्राएल में बहुत से लोग रखते थे, और वह वास्तव में गरीबों को धन्य कहता है और उनके बारे में बात करता है... वह वास्तव में धनवानों को पश्चाताप करने और दंड की अपेक्षा करने को तैयार रहने की चेतावनी देता है... उस दंड का आधार यह है कि ये लोग धन का संचय कर रहे हैं; आधारभूत बात यह है कि यदि परमेश्वर ने आपको धन से आशीषित किया है तो उसकी इच्छा यह है कि आप इसे अपने पड़ोसी के साथ साझा करें, परंतु वे इसका संचय अपने लिए कर रहे थे। वे अपने कर्मचारियों को उचित मजदूरी न देकर उन्हें छल रहे थे... धन परमेश्वर का दान है इसलिए इसका उपयोग परमेश्वर की इच्छा के अनुसार किया जाना चाहिए, अर्थात् न केवल अपने लिए बल्कि अंततः अपने पड़ोसी के लिए भी। दूसरे शब्दों में, प्रत्येक व्यापार "अपने पड़ोसी के साथ अपने समान प्रेम रख," के सिद्धांत पर चलना चाहिए।
155
— रेव्ह. डेविड लुइस
पद 5:7-12 में बुद्धि और भविष्य पर आधारित याकूब के विचार-विमर्श का तीसरा भाग भविष्य के लिए परमेश्वर की योजना के प्रकट होने की धीरज के साथ प्रतीक्षा करने की ओर मुड़ता है।
156
धीरज के साथ प्रतीक्षा करना (5:7-12)
याकूब ने उन लोगों की आलोचना की थी जिन्होंने बुद्धि के लिए परमेश्वर पर निर्भर न होकर योजनाएँ बनाई थीं। और उसने उन्हें चेतावनी दी थी जिन्होंने धन संचय करने और गरीबों का शोषण करने के द्वारा परमेश्वर की बुद्धि की उपेक्षा की थी कि वे परमेश्वर के दंड को देखेंगे। परंतु इसके बाद याकूब ने उन लोगों को प्रोत्साहित किया जो इतिहास की पूर्णता को लाने के लिए परमेश्वर की धीरज के साथ प्रतीक्षा करते हुए दुःख उठा रहे थे। पद 5:7-8 को सुनिए जहाँ याकूब ने इस रूपक का प्रयोग किया :
157
इसलिये हे भाइयो, प्रभु के आगमन तक धीरज धरो। देखो, किसान पृथ्वी की बहुमूल्य फसल की आशा रखता हुआ प्रथम और अन्तिम वर्षा होने तक धीरज धरता है। तुम भी धीरज धरो; और अपने हृदय को दृढ़ करो, क्योंकि प्रभु का आगमन निकट है (याकूब 5:7-8)।
158
जैसा कि हमने अभी दर्शाया, इस खंड में याकूब के वचनों ने धनवानों को डाँटने से कुछ अधिक किया। उन्होंने गरीबों और सताए हुओं को भी प्रोत्साहित किया है। याकूब की कड़ी फटकार ने उसके पाठकों को स्मरण दिलाया कि न्याय का दिन आने वाला है। और उस समय, जो विश्वासयोग्यता के साथ परमेश्वर पर निर्भर रहे थे उन्हें प्रतिफल मिलेगा। इस प्रकार उसने विश्वासयोग्य लोगों को भक्तिपूर्ण ज्ञान के मार्ग पर चलने, अपने विश्वास के अंगीकरण को जीवन में लागू करने, भविष्य के लिए परमेश्वर की योजना की पूर्णता के प्रकाश में परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारी बनने के लिए प्रोत्साहित किया।
159
अपने पाठकों को यह समझाने के बाद कि कैसे बुद्धि आनंद, आज्ञाकारिता और भविष्य से संबंधित है, याकूब की पुस्तक बुद्धि और प्रार्थना के एक संक्षिप्त व्यवहारिक प्रयोग के साथ समाप्त होती है।
160
याकूब के पाठक कई तरह के विषयों से जूझ रहे थे। वे अपने घरों से बाहर तितर-बितर थे। धनवान गरीबों पर अत्याचार कर रहे थे। वे एक दूसरे से वाद-विवाद कर रहे थे और चोट पहुँचा रहे थे। ऐसा प्रतीत होता है कि उनमें से कई अपनी स्वार्थी अभिलाषाओं के अधीन थे। और वे ऐसे रूपों में जीवन जीने में कठिनाई महसूस कर रहे थे जो उनके विश्वास के अंगीकरण के साथ मेल खाएँ। इसलिए इस अंतिम खंड में याकूब ने उन्हें सिखाया कि इन संघर्षों का सामना करते समय मसीही समुदाय में क्या करना चाहिए। पत्री के आरंभ में दी गई शिक्षा के समान यहाँ याकूब ने उन्हें निर्देश दिया कि वे स्वयं को प्रार्थना के प्रति समर्पित करें। कष्टों या आनंद के समय में, जब वे बीमारी से संघर्ष कर रहे हों, यहाँ तक कि व्यक्तिगत पाप के कारण आई बीमारी के समय में भी, जिनके पास बुद्धि है वे प्रार्थना करेंगे। पद 5:13-14 को सुनिए जहाँ याकूब ने अपने पाठकों से यह कहा :
161
यदि तुम में कोई दु:खी है, तो वह प्रार्थना करे। यदि आनंदित है, तो वह स्तुति के भजन गाए। यदि तुम में कोई रोगी है, तो कलीसिया के प्राचीनों को बुलाए, और वे प्रभु के नाम से उस पर तेल मल कर उसके लिये प्रार्थना करें (याकूब 5:13-14)।
162
स्पष्ट है कि याकूब चाहता था कि उसके पाठक प्रत्येक परिस्थिति में बुद्धि के लिए परमेश्वर के निकट आएँ। इसका कारण पद 16 में पर्याप्त रूप से स्पष्ट है जहाँ याकूब ने यह कहा :
163
धर्मी जन की प्रार्थना के प्रभाव से बहुत कुछ हो सकता है (याकूब 5:16)।
164
कष्टों में धीरज धरने और प्रार्थना करने की बुलाहट के साथ अपनी पत्री के मुख्य भाग को समाप्त करने के बाद याकूब ने एक उत्साहपूर्ण उपदेश के साथ पत्री को समाप्त किया।
165
पद 5:19-20 में याकूब ने अपने पाठकों से एक दूसरे की देखभाल करने का और उन्हें वापस लाने का आग्रह किया जो सत्य से भटक गए थे। उसने उन्हें स्मरण दिलाया कि विश्वास के समुदाय में भाइयों और बहनों के रूप में उनका यह दायित्व और अधिकार है कि वे लोगों को फिर से विश्वास की ओर लेकर आएँ जो सचमुच उद्धार करता है।
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याकूब की पत्री के इस परिचय में हमने इसकी पृष्ठभूमि को देखा है और इसके लेखक, पाठक और लिखे जाने के अवसर पर ध्यान दिया है। हमने पत्री की सरंचना और विषय-वस्तु का भी अध्ययन किया है और यह देखा है कि कैसे यह पुस्तक आनंद, आज्ञाकारिता, शांति, भविष्य और प्रार्थना के द्वारा उन विश्वासियों के लिए नए नियम की बुद्धि की पुस्तक का काम करती है जो कष्टों में निराशा का सामना कर रहे हैं।
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याकूब की पत्री ने पहली सदी के विश्वासियों को परमेश्वर की बुद्धि को खोजने की चुनौती दी ताकि वे परीक्षाओं को सहते समय आनंद प्राप्त करें। निस्संदेह आप और मैं याकूब के मूल पाठकों की अपेक्षा बहुत ही भिन्न परिस्थितियों में रहते हैं। परंतु हम भी परीक्षाओं का सामना करते हैं, और हमें भी उन परीक्षाओं का सामना करने में परमेश्वर की बुद्धि की आवश्यकता है। याकूब के पहले पाठकों के समान ही हमें उस पूरे आनंद की आवश्यकता है जो परमेश्वर की बुद्धि प्रदान करती है। यद्यपि इस अध्याय में हमने केवल उन बातों को देखा है जो यह पुस्तक प्रदान करती है, पर फिर भी एक बात स्पष्ट हो जानी चाहिए : याकूब की पत्री प्रत्येक युग के लिए बुद्धि से भरे जीवन को जीने का मार्ग दिखाती है। और इस पुस्तक को हम जितना अधिक अपने जीवनों पर लागू करते हैं, उतना अधिक हम उस पूरे आनंद की आशीषों को प्राप्त करेंगे जो परमेश्वर अपने लोगों को देता है, फिर चाहे हम किसी भी प्रकार की परीक्षाओं या परेशानियों का सामना कर रहे हों।
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